छठा सर्ग का भावार्थ

Arpit Nageshwar
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‘रश्मिरथी’ के छठे सर्ग में महाभारत युद्ध का एक अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। यह सर्ग भीष्म पितामह के पतन के बाद आरम्भ होता है। जब भीष्म शरशय्या पर लेट जाते हैं, तब कर्ण का युद्ध में प्रवेश संभव होता है, क्योंकि उसने प्रण लिया था कि जब तक भीष्म सेनापति रहेंगे, वह शस्त्र नहीं उठाएगा।

भीष्म और कर्ण के बीच पहले से ही वैचारिक दूरी थी। भीष्म कर्ण को दुर्योधन का अनुयायी मानते थे और उसके प्रभाव को उचित नहीं समझते थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कर्ण को ‘अर्धरथी’ कहकर उसका अपमान भी किया था। फिर भी जब कर्ण शरशय्या पर पड़े भीष्म से आशीर्वाद लेने जाता है, तो उसके मन में कोई कटुता नहीं होती। वह विनम्र भाव से उनके चरणों में प्रणाम करता है और युद्ध के लिए आज्ञा माँगता है।

भीष्म उसे समझाते हैं कि यह युद्ध केवल विनाश लाएगा। वे कहते हैं कि इस महासमर में मानवता का ह्रास होगा और अंत में किसी की भी सच्ची विजय नहीं होगी। वे कर्ण को सावधान करते हैं कि युद्ध का परिणाम चाहे जो हो, हानि दोनों पक्षों की ही होगी। यहाँ कवि युद्ध की निरर्थकता और उसकी विनाशकारी प्रवृत्ति पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करते हैं।

किन्तु कर्ण अपने कर्तव्य और मित्रता के बंधन से बँधा हुआ है। वह दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा निभाना चाहता है। उसके लिए अब पीछे हटना संभव नहीं है। वह आशीर्वाद लेकर युद्धभूमि में उतरता है और अपनी अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन करता है। उसके प्रहारों से पाण्डव सेना विचलित हो उठती है और युद्ध का स्वरूप और भी भीषण हो जाता है।

इस सर्ग में कवि यह भी स्पष्ट करते हैं कि कोई भी युद्ध पूर्ण रूप से ‘धर्मयुद्ध’ नहीं हो सकता। जब हिंसा प्रारम्भ हो जाती है, तब धर्म पीछे छूट जाता है। धर्म केवल लक्ष्य की प्राप्ति में नहीं, बल्कि उस लक्ष्य तक पहुँचने के साधनों की पवित्रता में निहित होता है। युद्ध में मनुष्य अक्सर विजय की अधीरता में साधनों की मर्यादा भूल जाता है।

युद्ध के दौरान जब कर्ण के प्रचंड पराक्रम से पाण्डव सेना संकट में पड़ जाती है, तब श्रीकृष्ण एक नीति का सहारा लेते हैं। वे जानते हैं कि कर्ण के पास ‘एकघ्नी’ नामक दिव्य अस्त्र है, जो केवल एक बार प्रयोग किया जा सकता है और जिससे जिस पर प्रहार हो, उसकी मृत्यु निश्चित है। श्रीकृष्ण नहीं चाहते कि यह अस्त्र अर्जुन पर चले, इसलिए वे भीमपुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में बुलाते हैं।

घटोत्कच अपनी मायावी शक्ति और रात्रि के प्रभाव से कौरव सेना में भारी विनाश करता है। उसके आतंक से कौरवों की सेना व्याकुल हो उठती है। दुर्योधन भयभीत होकर कर्ण से प्रार्थना करता है कि वह एकघ्नी का प्रयोग कर घटोत्कच का वध करे और सेना को बचाए।

कर्ण समझता है कि यदि वह इस अस्त्र का प्रयोग कर देगा, तो अर्जुन के विरुद्ध उसका सबसे बड़ा सहारा समाप्त हो जाएगा। फिर भी वह मित्रता और कर्तव्य को सर्वोपरि मानकर एकघ्नी चला देता है। उसके प्रहार से घटोत्कच वीरगति को प्राप्त होता है। कौरव सेना में उल्लास छा जाता है, परन्तु पाण्डव पक्ष शोक में डूब जाता है।

इस प्रसंग में एक विशेष दृश्य उभरता है— जहाँ सब लोग शोक कर रहे हैं, वहीं श्रीकृष्ण मुस्करा रहे हैं। उनकी मुस्कान इस बात का संकेत है कि अर्जुन का जीवन बच गया, क्योंकि कर्ण का अमोघ अस्त्र नष्ट हो चुका है। यह रणनीतिक विजय है, यद्यपि भावनात्मक रूप से यह क्षति का क्षण है।

कौरव पक्ष में जयघोष के बीच कर्ण का मन संतुष्ट नहीं है। वह जानता है कि उसने अपना सर्वश्रेष्ठ अस्त्र खो दिया है और अब अर्जुन से उसका युद्ध पहले जैसा नहीं रहेगा। इस प्रकार, बाहरी विजय के बावजूद वह भीतर से पराजित-सा अनुभव करता है।

इस सर्ग का समग्र भावार्थ यह है कि युद्ध में कोई भी पूर्ण विजेता नहीं होता। हर विजय के पीछे कोई न कोई गहरी हानि छिपी होती है। कर्ण की निष्ठा, वीरता और त्याग उसे महान बनाते हैं, परन्तु उसकी नियति उसे निरंतर संघर्ष और वेदना की ओर ले जाती है। कवि ने इस सर्ग में वीर रस के साथ करुण और शान्त रस का भी सशक्त चित्रण किया है।

Arpit Nageshwar

✍️ Arpit Nageshwar

Post-graduated | Web Developer | +3 yr Experience